पाकिस्तान ने ईरान के लड़ाकू विमानों को छिपाकर दुनिया को कैसे झांसा दिया

पाकिस्तान ने ईरान के लड़ाकू विमानों को छिपाकर दुनिया को कैसे झांसा दिया

पाकिस्तान और ईरान के रिश्ते हमेशा से एक पहेली रहे हैं। बाहर से ये दोनों देश एक-दूसरे पर उंगलियां उठाते दिखते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही है। हाल ही में जो खबरें आई हैं, वे साफ बताती हैं कि इस्लामाबाद ने कैसे अमेरिका की आंखों में धूल झोंककर तेहरान की मदद की। बात सिर्फ डिप्लोमेसी की नहीं है, बल्कि यह एक खतरनाक खेल था जिसमें ईरान के सैन्य विमानों को पाकिस्तानी जमीन पर सुरक्षित ठिकाना दिया गया।

नूर खान एयरबेस का नाम इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ऊपर आता है। यह कोई मामूली जगह नहीं है। यह रावलपिंडी में स्थित पाकिस्तान का एक बेहद संवेदनशील मिलिट्री बेस है। जब ईरान को लगा कि अमेरिका उसके हवाई बेड़े को तबाह कर सकता है, तब पाकिस्तान ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया। यह खुलासा उन लोगों के लिए झटका है जो मानते हैं कि पाकिस्तान पूरी तरह से वाशिंगटन के खेमे में है। असल में, पाकिस्तान की फॉरेन पॉलिसी "डबल गेम" पर टिकी है।

अमेरिका को भनक तक नहीं लगने दी

ईरान के विमानों को पाकिस्तान लाना कोई छोटा काम नहीं था। इसके लिए महीनों की प्लानिंग और सीक्रेसी की जरूरत थी। पाकिस्तान जानता था कि अगर सीआईए या अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को इसकी खबर लग गई, तो अरबों डॉलर की सैन्य मदद रुक सकती है। फिर भी उन्होंने यह जोखिम लिया। क्यों? क्योंकि वे क्षेत्र में एक नया पावर बैलेंस बनाना चाहते थे।

ईरान के पास उस वक्त अपने एयरक्राफ्ट बचाने के लिए बहुत कम रास्ते थे। खाड़ी के बाकी देश अमेरिका के साथ थे। ऐसे में पाकिस्तान का नूर खान एयरबेस उनके लिए "सेफ हेवन" बन गया। कई रिपोर्ट्स इशारा करती हैं कि इन विमानों को कमर्शियल उड़ानों के बीच में या रात के अंधेरे में लैंड कराया गया। यह ऑपरेशन इतना गुप्त था कि पाकिस्तान के अपने कई कैबिनेट मंत्रियों को भी इसकी जानकारी नहीं थी।

नूर खान एयरबेस ही क्यों चुना गया

रावलपिंडी का नूर खान एयरबेस रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। यह राजधानी के करीब है और यहां की सुरक्षा अभेद्य मानी जाती है। यहां से ईरान के विमानों को न केवल रडार से बचाना आसान था, बल्कि जरूरत पड़ने पर उन्हें मेंटेनेंस भी दी जा सकती थी। पाकिस्तान के पास उस समय ऐसे कई टेक्नीशियन थे जो पुराने सोवियत और अमेरिकी विमानों को संभालने में माहिर थे, जो ईरान के काम आ सकते थे।

ईरान ने अपने सबसे कीमती विमानों को वहां भेजा। उन्हें डर था कि अमेरिका उनके रनवे और हैंगर को निशाना बनाएगा। जब ये विमान पाकिस्तान पहुंचे, तो उन्हें जनरल एविएशन के शेड में छिपा दिया गया। दुनिया को लगा कि ये पाकिस्तान के अपने पुराने विमान हैं। यह एक मास्टरस्ट्रोक था जिसने ईरान की वायुसेना की रीढ़ को टूटने से बचा लिया।

क्या यह सिर्फ ईरान की मदद थी

नहीं, यह सौदा एकतरफा नहीं था। पाकिस्तान को इसके बदले में ईरान से खुफिया जानकारी और सीमा पर शांति का आश्वासन मिला। बलूचिस्तान सीमा पर हमेशा तनाव रहता है। ईरान को खुश रखकर पाकिस्तान ने अपनी पश्चिमी सीमा को सुरक्षित करने की कोशिश की। इसके अलावा, ईरान ने तेल और गैस की कीमतों में रियायत देने का भी वादा किया था। पाकिस्तान की जर्जर अर्थव्यवस्था के लिए यह एक बड़ा लालच था।

इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में इसके मायने

जब हम वैश्विक राजनीति की बात करते हैं, तो कोई भी काम बिना स्वार्थ के नहीं होता। पाकिस्तान ने अमेरिका को यह दिखाया कि वह आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में उनका साथी है, जबकि अंदरूनी तौर पर उसने ईरान जैसे अमेरिकी दुश्मन को पनाह दी। यह दोगलापन पाकिस्तान की पुरानी पहचान है। भारत के नजरिए से देखें तो यह और भी गंभीर हो जाता है। अगर पाकिस्तान और ईरान इतने करीब आते हैं, तो यह क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां पैदा करता है।

ईरान का डिफेंस सिस्टम मजबूत है, लेकिन उसके पास आधुनिक लड़ाकू विमानों की कमी है। पाकिस्तान ने उसे अपने एयरबेस इस्तेमाल करने देकर एक तरह से "बैकडोर एंट्री" दी। इससे मिडिल ईस्ट का पूरा समीकरण बदल गया। अमेरिका को जब इस बात का अहसास हुआ, तब तक काफी देर हो चुकी थी। पाकिस्तान ने हमेशा की तरह "इनकार" वाली पॉलिसी अपनाई और सबूतों को मिटाने की कोशिश की।

क्या अब भी यह सिलसिला जारी है

आज के हालात और भी जटिल हैं। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ता तनाव पाकिस्तान को फिर से उसी मोड़ पर खड़ा कर रहा है। सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान फिर से वही गलती करेगा? खुफिया सूत्रों का कहना है कि आज भी दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग खत्म नहीं हुआ है। ट्रेनिंग और स्पेयर पार्ट्स का लेन-देन जारी है।

पाकिस्तान की जनता को यह बताया जाता है कि वे "उम्मा" की रक्षा कर रहे हैं, लेकिन हकीकत में यह सत्ता और सर्वाइवल की जंग है। ईरान के विमानों को छिपाना सिर्फ एक घटना नहीं थी, यह एक ट्रेंड की शुरुआत थी। पाकिस्तान ने दुनिया को दिखा दिया कि वह अपने फायदे के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, चाहे उसे अपने सबसे बड़े डोनर अमेरिका को ही धोखा क्यों न देना पड़े।

ईरान के साथ इस गुप्त डील ने पाकिस्तान की साख पर बट्टा लगाया है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अब पाकिस्तान की बातों पर यकीन करना मुश्किल हो गया है। जब आप एक तरफ एफ-16 के लिए अमेरिका से मिन्नतें करते हैं और दूसरी तरफ ईरान के रूसी मिग विमानों को अपने बेस पर छिपाते हैं, तो आपकी विश्वसनीयता शून्य हो जाती है।

इस पूरे मामले से एक बात साफ है कि दक्षिण एशिया की राजनीति में जो दिखता है, वह होता नहीं है। पाकिस्तान की यह "खुली पोल" सिर्फ एक शुरुआत है। आने वाले समय में ऐसे कई और राज खुल सकते हैं जो बताएंगे कि कैसे पर्दे के पीछे बड़े देशों के साथ खेल खेला गया। आपको इन घटनाक्रमों पर नजर रखनी चाहिए क्योंकि इनका सीधा असर भारत की सुरक्षा और कश्मीर जैसे मुद्दों पर पड़ता है। नजर रखिए कि कैसे एयरबेस और मिलिट्री मूवमेंट बदल रहे हैं।

NH

Naomi Hughes

A dedicated content strategist and editor, Naomi Hughes brings clarity and depth to complex topics. Committed to informing readers with accuracy and insight.