बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना के खूनी खेल की कड़वी सच्चाई

बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना के खूनी खेल की कड़वी सच्चाई

बलूचिस्तान से आती खबरें अक्सर रूह कंपा देने वाली होती हैं। हाल ही में पाकिस्तानी सेना की भारी गोलाबारी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वहां नागरिक सुरक्षित नहीं हैं। इस ताजा हमले में 12 बेगुनाह नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया गया। ये कोई पहली घटना नहीं है। दशकों से बलूच लोग इसी तरह के दमन का सामना कर रहे हैं। जब आप नक्शे पर बलूचिस्तान को देखते हैं, तो ये सिर्फ एक जमीन का टुकड़ा नजर आता है। हकीकत इससे कहीं ज्यादा डरावनी है। यहां के लोग अपनी ही धरती पर डर के साये में जीने को मजबूर हैं।

पाकिस्तानी सेना ने जिस तरह से रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया, वो किसी भी अंतरराष्ट्रीय कानून का खुला उल्लंघन है। मरने वालों में महिलाएं और बच्चे भी शामिल बताए जा रहे हैं। ये गोलाबारी अचानक नहीं हुई। इसके पीछे एक सोची-समझी रणनीति काम करती है। सेना का मकसद साफ है—खौफ पैदा करना। जब आवाजें उठती हैं, तो उन्हें बंदूकों के दम पर दबा दिया जाता है। Discover more on a similar subject: this related article.

बलूचिस्तान में नागरिकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा का असल चेहरा

इस इलाके में होने वाली हिंसा को अक्सर 'आतंकवाद के खिलाफ जंग' का नाम देकर दबा दिया जाता है। लेकिन क्या 12 नागरिकों को मारना आतंकवाद से लड़ना है? बिल्कुल नहीं। स्थानीय लोगों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि सेना सीधे तौर पर गांव के घरों को निशाना बनाती है। ये हमले अक्सर उन इलाकों में किए जाते हैं जहां सेना को बलूच विद्रोहियों की मौजूदगी का शक होता है। नुकसान हमेशा आम जनता को उठाना पड़ता है।

बलूच मानवाधिकार परिषद (BHRC) और एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाएं सालों से इन वारदातों पर रिपोर्ट दे रही हैं। पाकिस्तान की सरकार इन रिपोर्ट्स को खारिज करती रही है। लेकिन सच छिपता नहीं है। सोशल मीडिया पर आने वाले वीडियो और तस्वीरें गवाह हैं कि कैसे घरों को मलबे में तब्दील कर दिया गया। ये गोलाबारी सिर्फ जान नहीं लेती, बल्कि पूरे के पूरे परिवारों का भविष्य खत्म कर देती है। Further analysis by Associated Press explores comparable views on the subject.

सेना की कार्रवाई और अंतरराष्ट्रीय चुप्पी

दुनिया के बड़े देश अक्सर इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रहते हैं। भू-राजनीतिक समीकरणों के चलते बलूचिस्तान की चीखें दब जाती हैं। चीन का 'चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा' (CPEC) इस पूरे विवाद की एक बड़ी वजह है। पाकिस्तान इस प्रोजेक्ट को सुरक्षित रखने के लिए बलूचिस्तान के हर विरोध को कुचल देना चाहता है। स्थानीय लोगों को लगता है कि उनके संसाधनों को लूटा जा रहा है। जब वे अपना हक मांगते हैं, तो उन्हें 'देशद्रोही' करार दिया जाता है।

सेना की इस गोलाबारी में तोपखाने और लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है। डेरा बुगती और कोहलू जैसे जिलों में स्थिति सबसे खराब रहती है। यहां संचार के साधन काट दिए जाते हैं ताकि बाहर की दुनिया को पता ही न चले कि अंदर क्या हो रहा है।

क्यों मर रहे हैं बेगुनाह नागरिक

  • अंधाधुंध फायरिंग: सेना अक्सर संदिग्ध ठिकानों पर निशाना साधने के बजाय पूरे इलाके पर गोलाबारी करती है।
  • इंटेलिजेंस की विफलता: गलत जानकारी के आधार पर किए गए ऑपरेशन मासूमों की जान ले लेते हैं।
  • दमनकारी नीतियां: लोगों के मन में डर बिठाना ताकि वे अधिकारों की बात न करें।

मानवाधिकारों का होता सरेआम कत्ल

बलूचिस्तान में गायब होते लोग यानी 'एनफोर्स्ड डिसएपीयरेंस' एक बहुत बड़ी समस्या है। गोलाबारी में जो नहीं मरते, उन्हें अक्सर उठा लिया जाता है। उनके परिवार सालों तक इंतजार करते हैं, लेकिन कोई जवाब नहीं मिलता। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग ने कई बार इस पर चिंता जताई है। पाकिस्तान के भीतर भी सुप्रीम कोर्ट ने कई मौकों पर सवाल उठाए हैं। नतीजा? शून्य।

सेना वहां एक समानांतर सरकार चलाती है। निर्वाचित सरकार के पास बलूचिस्तान के मामलों में बोलने की ताकत बहुत कम है। ये एक ऐसी सच्चाई है जिसे पाकिस्तान के मुख्यधारा के मीडिया में जगह नहीं मिलती। वहां के पत्रकारों को भी सच बोलने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है।

भारत और दुनिया की जिम्मेदारी

जब भी बलूचिस्तान में खून बहता है, भारत में इसकी गूँज सुनाई देती है। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से ये क्षेत्र महत्वपूर्ण रहा है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के उल्लंघन का मुद्दा उठाया है। लेकिन सिर्फ बात करने से काम नहीं चलेगा। दुनिया को ये समझना होगा कि जब तक बलूचिस्तान में स्थिरता नहीं आएगी, दक्षिण एशिया में शांति का सपना अधूरा रहेगा।

पाकिस्तानी सेना की गोलाबारी ने जिन 12 लोगों की जान ली, वे आंकड़े नहीं थे। वे इंसान थे जिनके सपने थे। उनके पीछे अब सिर्फ आंसू और नफरत बची है। ये नफरत ही आगे चलकर और बड़े संघर्षों को जन्म देती है। हिंसा से शांति कभी नहीं आती, ये इतिहास गवाह है।

जमीनी हकीकत जो कोई नहीं बताता

मैंने कई बलूच शरणार्थियों से बात की है। उनकी आंखों में अपने घर लौटने की चाहत तो है, पर वहां की सेना का खौफ उससे कहीं ज्यादा बड़ा है। वे बताते हैं कि कैसे आधी रात को घर के दरवाजे तोड़े जाते हैं। बच्चों के सामने उनके पिताओं को घसीटा जाता है। अगर आप सवाल पूछें, तो आपको 'गायब' कर दिया जाएगा। ये कोई डरावनी कहानी नहीं है, ये वहां की रोजमर्रा की जिंदगी है।

पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में रहने वाले लोग भी इस दर्द को महसूस नहीं कर पाते। उन्हें वही दिखाया जाता है जो सेना चाहती है। एक प्रोपेगेंडा मशीनरी 24 घंटे काम करती है ताकि बलूच आंदोलन को सिर्फ 'विदेशी साजिश' बताया जा सके।

अब आगे क्या करना चाहिए

अगर आप इस मुद्दे पर गंभीर हैं, तो सिर्फ खबरें पढ़ना काफी नहीं है। आपको आवाज उठानी होगी।

  1. सोशल मीडिया का इस्तेमाल करें: बलूचिस्तान में हो रहे अत्याचारों के बारे में हैशटैग चलाएं। दुनिया को बताएं कि वहां क्या हो रहा है।
  2. मानवाधिकार संगठनों को सपोर्ट करें: जो लोग जमीन पर काम कर रहे हैं, उन्हें संसाधनों की जरूरत होती है।
  3. जानकारी साझा करें: इस तरह के लेखों को उन लोगों तक पहुंचाएं जो इस मुद्दे से अनजान हैं।

बलूचिस्तान का मुद्दा सिर्फ पाकिस्तान का आंतरिक मामला नहीं रह गया है। ये मानवता के खिलाफ अपराध है। अगर आज हम चुप रहे, तो कल इतिहास हमसे सवाल पूछेगा। 12 नागरिकों की मौत सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। हमें जागना होगा। सेना की गोलियों और तोपों का जवाब केवल अंतरराष्ट्रीय दबाव और एकजुट आवाज से ही दिया जा सकता है। अब समय आ गया है कि बलूचिस्तान के लोगों को उनका हक मिले और वहां की मिट्टी में खून गिरना बंद हो।

NH

Naomi Hughes

A dedicated content strategist and editor, Naomi Hughes brings clarity and depth to complex topics. Committed to informing readers with accuracy and insight.